शीघ्रमिलन

I wrote this poem speciallyfor some 1.

2 days ago i wokeup early-morning,

N suddenly the moments i started to see that we spend together.n that time m still half sleep. N the first line of this poem just hit me. 

So i decided to write it down . N here it is. 

Pls read it guys n tell me how it is.

👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇

कातील-ए-ईश्क आपसे करु तो कैसै करू

तौबा ये जिश्म आपका। 

महेकता भी है।

तरसाता भी है।

तौबा ये रुप आपका

हर पल याद आता है।

हर घडी में खौ जाता हु।

ये आंखो का ‘करीशमा’ आपका ऐसा कातील

एक नजरसे कत्लेआम करता है हमारा।

हमे सम्मोहीत करता है हर बार।

ये आपका सालो बाद मीलने आना

जैसे मेरा फुला न समाना।

आपकी यादो का छुटकारा।

फिर ये आपका करीब आना

युही चलते कंधो का टकराना।

और आपका प्यारा सा स्पर्श होना।

फिर प्यारी प्यारी बाते करना

हमे आपकी मुसकान दिखाना

कभी कंधेपे हाथ रखना

तब खो जाता हु मे तुम मै।

जब तुमने आंखो मे आंखे डाल कर देखा

जैसे ये आलम थम सा गया।

दो घडी काफी है ऐसी

मुजे गीरफतार करने के लिये।

कभी अंत ना हो एसे लम्है

जब हम दोनो साथ साथ हो।

हाथो मे हाथ हो।

बाहो मे बाहे हो।

और मीलन पास हो।

कोई ईस महेकमे को कहेदो

जंग छिड चुकी है हमारी

सम्मेलन जल्द ही होगा।

‘मनु’ का जुडना मरके भी होगा।

                                   –  मनीष चोटलीया

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4 thoughts on “शीघ्रमिलन

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